अब्राहमिक विचारधारा और दमन की राजनीति

अब्राहमिक पंथ एकल सत्य, एक परमात्मा (और मत के कुत्सित प्रचार) के मत में विश्वास रखते है और यही सोच पश्चिम/मध्य-पूर्व उसके सानिध्य में पनपने वाली सभी विचारधाराओं के जड़ में देखी जा सकती है| एक परमात्मा और उसके द्वारा चुने गये लोग, इस विचारधारा के साथ ना जाने विश्व में कितने युद्ध किए गये और ना जाने कितने बेगुनाहों को जान देनी पड़ी| यह उत्पाद न सिर्फ़ मध्यकालीन युग में पंथ के नाम पर ईसाइयों और मुसलमानों ने मचाया बल्कि इसे आज भी विश्व में अन्य सामान विचारधाराओं द्वारा मचाया जा रहा है| आज इन पश्चिम में उपजी कुछ विचारधाराओं को मार्क्सिज़म,फेमिनिसम(नारीवाद) तथा अन्य नामों से जाना जाता है|

इन विचारधाराओं का मूल स्वरूप क्या है?

1) एकलवाद- यह विश्वास केवल एक सत्य पथ है| इस सोच के कारण अनुयायी स्वयं को दूसरे गैर-अनुयायी/न मानने वालो से ऊपर समझते हैं|

2) पंथ परिवर्तन- प्राचार या दंड/एवम प्रताड़ना द्वारा अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाना

3) नास्तिक की इज़्ज़त मिट्टी में मिलाना- चुन-2 कर नाम रखना

आज हम ऐसी ही कुछ नयी विचारधारों की पोल खोलेंगें जो स्वयं को आधुनिकता के चोले में छुपा कर हमला करती है परंतु जिनका स्वरूप इस्लाम या ईसाई मज़हब जैसा ही है|

 

गमछा ओढ़े कुख्यात ‘कलम वाली बाई’ माओवादी परचून व्यापारियों से ध्यानपूर्वक हथियारों की मासिक किराना-सामग्री का ऑर्डर लेते हुए

राजनीतिक समाजवाद(मार्क्सिज़म)

  1.  अँधा एवं अटूट विश्वास की समाजवाद के बूते ही एक न्यायिक समाज का गठन हो सकता है, बाकी सब रास्ते झूठे हैं| अब्राहमिक पंथ जहाँ मृत्योप्रांत जन्नत का झूठ बेचतें हैं, समाजवादी पृथ्वी पर ही जन्नत बेचनें का स्वांग रचते हैं|
  2.  जब बातचीत से हृदय परिवर्तन ना हो तो बल प्रयोग में समाजवादी सबसे आगे रहते हैं- चाहे वह स्टालिन का रूस हो या हमारे हिन्दुस्तान के नक्सलवादी|
  3. जब अल्पमत में हों तब अलग-2 नाम धरते हैं तथा जैसे ही सत्ता मिले तो बल प्रयोग कर दमन करते हैं| जैसे हिन्दुस्तान में ही देख लीजिए-हिंदू धरम की बात करते ही लोगों को फासीवादी और ना जाने क्या-2 अनर्गल चिप्पियाँ चस्पा कर दी जाती हैं| ऐसे ही अन्य नाम हैं-पूंजीवादी,ब्राह्माणवादी इत्यादि|

 

कुछ ‘शान्तिप्रिय’ नारीवादी अपने ‘शान्तिपूर्ण’ विरोध-प्रदर्शन के दौरान

नारीवाद

  1. इनका अटूट विश्वास यह है कि प्राचीनकाल से अब तक सभी सामाजिक संस्थाओं का जन्म केवल नारी के दमन के लिए ही हुआ है| नारी के अधिकार ही सर्वोपरि हैं बाकी संतान और परिवार का कोई महत्व नही है|
  2.  अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए नारीवाद पश्चिम के विश्वविद्यालयों और संचार माध्यमों जैसे मीडीया का प्रयोग करता है| इनका बॉलीवुड में काफ़ी बोलबाला है|
  3. अभी इसकी जड़ हिन्दुस्तान में नहीं फैली हैं अन्यथा पश्चिम  में अगर आप कुछ चुनिंदा नारीवाद समर्थकों के विरुदध कुछ लिखेंगें या बोलेंगें तो आप अपनी सामाजिक हैसियत अथवा नौकरी तक खो बैठेंगें| नारीवादी समर्थक आपको नीचा दिखाने के लिए सामान्यतः चुनिंदा शब्दों का प्रयोग करते हैं, जैसे-रूढ़ीवादी,  पितृसत्तात्मक  इत्यादि (अब तक सम्भवतः आपको इस बात की अनुभूति होना शुरू हो गयी होगी कि ये सब ‘क्रांतिकारी’ अपनी दूकान दूसरों को लानतें भेजने तथा गाली-गलौज, ‘नामकरण’ करने पर चलाते हैं; तथ्यों से इनका नाता वैसा ही है जैसा किसी कूकुर का पानी से)|

 

तथाकथित देसी ‘पर्यावरणविद’ पूरे भक्ति-भाव से वरुण देव से वर्षा रोकने की प्रार्थना की मुद्रा में

पर्यावरणवाद

  1. इन लोगों का अटूट विश्वास है की आज के बड़े पर्यावरण बदलाव के पीछे केवल मनुष्य का ही हाथ है| अभी तक के वैज्ञानिक तथ्य स्थानीय स्तर पर तो बदलाव को जाँच सकते हैं लेकिन यह कहना की भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि भी मनुष्य गतिविधि के कारण हो रही है,यह पूरा सत्य नहीं है|
  2. यह जाँचने के लिए अनुसंधान पर काफ़ी खर्चा किया गया है और प्रोपेगेंडा पर भी| पर नैतिकता का नाटक करने वालों को सागर में वेल मछली बचाने की सोच तो आ जाती है, परंतु भूख और विकास के अभाव में मरने वाले हिन्दुस्तानी और अफ्रीकी लोगों पर ज़रा भी दया नही आती|
  3. अगर आप भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि पर सवाल भी उठाएँ तो आप पर्यावरण विरोधी हैं, अगर आप कोयला आधारित बिजली संयत्र लगाएँ तो आप अचानक आदिवासी विरोधी हो जातें हैं और यदि फिर आप प्रमाणु संयत्र लगाने की सोचने लगें तो आप पूंजीपतियों के समर्थक हो जाते हैं|

 

हाथों में कायदेनुसार वैध प्रपत्र लिए बस के यूरो टनल पार करने की प्रतीक्षा में अप्रवासी

बहुसंस्कृतिवाद

  1. अटूट विश्वास की दुनिया की सभी संस्कृति एवं लोग समान हैं और सब मिलजुल कर रह सकते हैं| प्रवासियों को आसानी से बहला फुसलाकर और पढ़ाकर अपने जैसा बनाया जा सकता है|
  2. विद्यालयों में भी यही पढ़ाया जाता है की सब पंथ समान है और सब लोग अच्छे हैं| यह तर्क राजनीति के स्तर पर भी देखें जा सकते हैं-जैसे जर्मनी की चाँसलर आंजेला मर्कल ने फ़ेसबुक से प्रवासी विरोधी बातों को हटाने के लिए दबाव डाला| शर्म की बात यह है की यही जर्मनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते नही थकता|
  3. इस बीमारी के तहत अगर कोई इस्लाम की आतंकवादी प्रवर्ती की तरफ इशारा करे तो उसे इस्लाम विरोधी बुलाया जाता है| अगर प्रवासियों का विरोध करो तो जातिवादी बुलाया जाता है| हालाँकि हिंदुत्वादी बुलाकर अपमान करने पर कोई आपत्ति नही है क्यूंकी ऐसा कहना हलाल है|

यह तो विचारधाराओं की एक अधूरी सूची है, परंतु आप देख सकते हैं की सभी विचारधारा दुनिया बचाने का स्वांग अपने अनुयायीओं को बेच रहीं हैं| इन विचारधाराओं को बेचने वाले लोग सामान्यतः दोगले होते है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाटक करते हैं पर दूसरी विचारधाराओं को उभरने का मौका नही देते| एन.आई.टी श्रीनगर के छात्रों के लिए कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नही है, पर जे.एन.यू पर जान न्योछावर थी| अगर यह दोगलापन नही है, तो क्या है?

इन सभी विचारधाराओं का एक और दिलचस्प पहलू है और वह है इनका विदेश से लगाव| जैसे- 1962 के युद्ध में समाजवदियों का चीन को समर्थन| इसी प्रकार, देसी पर्यावरणवादी विदेशी एन.जी.ओ. के इशारे पर सभी प्रकार की विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं चाहे वह किसी भी प्रकार का बिजली संयत्र हो| देसी नारीवदियों का जितना कम व्याख्यान हो उतना बेहतर| हालाँकि बलात्कार के मामलों में भारत दुनिया से बहुत पीछे है, फिर भी इसे बलात्कार की राजधानी की उपाधि दे दी गयी है| और भारतीय नारीवादी विदेश के सम्मलेनों में यही बात बार-2 दोहराकार अपनी रोटी सेक रहे हैं जैसे असली आँकड़ों का कोई मोल ही नही है| बहुलतावाद समर्थक हिन्दुस्तानी मुसमलमानों की राष्ट्रभक्ति पर गाथायें लिखतें रहते हैं जबकि वो सिरिया में आतंकवादियों से जुड़ने के लिए लालायित हुए जा रहें हैं| पाकिस्तान की जीत की खुशी पर उन्हें पटाखे फोड़ते तो जैसे किसी ने देखा ही नही है|

तो भविष्य में अगर आप पर नये-2 शब्दों के तीर से वार किया जाए तो आप आसानी से समझ जाना की आप पर अब्राहमिक विचारधाराओं में से किसी ने हमला किया है| तब आप पर उनसे जुड़ने या लड़ने के लिए दबाब बनेगा| यदि आप अनुयायियों की श्रेणी में चलें जातें हैं तो आप का दिल खोल कर स्वागत होगा, अन्यथा आप पर कीचड़ उछाला जाएगा| आख़िरकार आपका नुकसान इस पर निर्भर करेगा की आप की समाज में क्या पहचान है| अब आपको यह समझने में भी आसानी होगी की उपरी समाज के लोग इन विचारधाराओं से खुलकर लोहा क्यूँ नहीं लेते| भला सड़कछाप लफ्फाजों और उठाईगिरों से कितने लोग उलझते हैं?!

छाया चित्र:

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