क्यों भारत की सेना ‘सेक्युलर’ नहीं होनी चाहिए

भारतीय सेना के विषय में गौरवान्वित करने वाले तथ्यों में से एक बहुचर्चित बात यह कही जाती है कि वह ‘सेक्युलर’ है तथा सम्प्रदाय/मज़हब से उसका कोई वास्ता नहीं। पर क्या यह बात आवश्यक हो कि ठीक ही है? प्रश्न यह है, कि, क्या मज़हब तथा सेना के संयोजन का राष्ट्र की सुरक्षा से कोई सम्बन्ध है? धर्म अथवा मज़हब किसी भी देश की एकता के पीछे के प्रमुखतम कारणों में से होते हैं। भारत के उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक, कोई भी वह क्षेत्र जहाँ हिन्दू अल्पसंख्या में हैं, अलगाववाद से ग्रसित है| यह एक कटु सत्य है तथा इसे केवल आंकड़ों में अपसामान्यता भर समझकर नकारा नहीं जा सकता| यदि हैदराबाद भौगोलिक रूप से पाकिस्तान की सीमा से सटा होता, तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज वह पाकिस्तान का एक और भाग होता, केवल अपने शासक के मज़हब के कारण| भारत के सेक्युलर अयतुल्लाह किन्चित-मात्र तर्क-बोध के बिना कहा करते हैं कि चूँकि इन्डिया एक सेक्युलर देश है, इसलिए यहाँ की सेना को भी सेक्युलर होना चाहिए; कि उसे मज़हब के आधार पर भेदभाव किये बिना मुसलमानों को अपनी टुकड़ियों में भर्ती करना चाहिए (वह भी तब जब हमारा प्रमुख दुश्मन देश एक मुस्लिम-बाहुल्य देश है जो स्वयं को इस्लाम के ठेकेदार की तरह विश्व के सम्मुख पेश करता रहता है)| यहाँ प्रश्न यह भी है, कि क्या सेना को अपनी कथित सेक्युलर पालिसी को जारी रखते हुए मुस्लिमों को अपनी उच्च श्रेणियों में जगह देनी चाहिए?! इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें इतिहास में मुस्लिम विश्वासघात की (दु:)घटनाओं पर दृष्टि डालनी होगी, उन स्थितियों में जहाँ वो मुस्लिम दुश्मनों की सेनाओं के विरुद्ध लड़ रहे थे, ऐसी सेनाओं में रहते हुए जो स्वयं मुस्लिम-साम्राज्यों की नहीं थीं|

 

सोवियत संघ से प्रमाण

लेख के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम व्यवहार को समझने के लिए सोवियत संघ विचार-विषय के लिए एक अप्रतिम उदाहरण है, विशेषतः एक सेक्युलर तथा नास्तिक समाज रहे होने के कारण भी| सोवियत सरकार मस्जिदों की कड़ी निगरानी रखा करती थी, तथा अपने नौकरशाहों को मस्जिदों के संचालन पर नज़र बनाये रखने का प्रभार भी दे रखा था, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वहाँ के मुस्लिम बच्चों को एक सेक्युलर शिक्षा मिलती रहे तथा वे सदैव सोवियत संघ के हितों को सर्वोपरि रखें, न कि अपने मज़हब के| परन्तु, इतने कड़े प्रयासों के बावजूद, यह सेक्युलरीकरण ढह गया, जैसे ही वे सोवियत-अफगान लड़ाई में जा घुसे, तथा बड़ी संख्या में उन्हें अपने मुस्लिम सैनिकों का विश्वासघात झेलना पड़ा|

लड़ाई के शुरू में, सोवियत हाईकमान ने अपनी मध्य-एशियाई मुस्लिम टुकड़ियों पर काफी भरोसा करते हुए उन्हें अफगानिस्तान में तैनात किया वहाँ अपने वामपंथी मित्रों के सहायतार्थ, ताकि वे सोवियत तथा अफगान सैनिकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सकें जिहादियों के विरुद्ध इस लड़ाई में (भाषाई घनिष्टता के कारण)| यह सोवियतों की एक बड़ी भूल साबित हुयी, कारण कि युद्ध आरम्भ होते ही उन्हें अपने मुस्लिम सिपाहियों के धोखे का सामना करना पड़ा| इन टुकड़ियों में अक्षमता इतनी अधिक थी, कि सोवियत संघ को युद्ध शुरू होने के मात्र तीन माह के भीतर ही इन्हें वापस बुलाने को बाध्य होना पड़ा, तथा इनकी जगह स्लाव मूल के सैनिकों को भेजना पड़ा|

मुस्लिम सिपाहियों से खतरा तीन स्तरों पर था – उनमें से कुछ स्थानीय लोगों से जा मिले, तथा बाकि लड़ने के इच्छुक नहीं थे, और कुछ तो खुलेआम बगावत करते हुए जिहादियों के टुकड़ियों में शामिल हो गए| कुछ आँकड़ों के अनुसार, सोवियत सेना से इनके भाग जाने की दर लगभग ६० से ८० प्रतिशत तक थी युद्ध के प्रथम वर्ष में| अब चूँकि सोवियत सेना को इन मध्य-एशियाई टुकड़ियों को वापस बुलाकर अपने युरोपीय टुकड़ियों को भेजना पड़ गया, तो उनका आकर काफी प्रभावित हुआ तथा इस युद्ध में इस तथ्य की एक निर्णायक भूमिका रही| हाँलाकि इन मध्य-एशियाई सिपाहियों का युद्ध के मैदान में वार्ताकारों के रूप में एक अहम् कार्य था, अपितु शुरू के अपसरण के चलते उन्हें उन्हें मिश्रित टुकड़ियों में ही फिर शामिल किया गया तथा जवाबी कार्रवाईयों इनकी भूमिका बहुत छोटी रही| पश्च दृष्टी में देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सोवियतों ने कुछ कड़े सबक सीखे|

 

मध्यकालीन भारत से प्रमाण

जब इस्लामी ताकतें समूचे भारत में कोहराम मचाये हुए थीं, तब दक्षिण का शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य अपनी हिन्दू जड़ों से पूर्णतः जुड़ा रहा| इस साम्राज्य के हिन्दू राजा अपनी प्रजा में हर किसी से समभाव रखा करते थे, तथा धर्म-मज़हब के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जाता था| यहाँ तक कि विजयनगर की सेना में मुस्लिम सिपाहियों को भी शामिल किया गया था| परन्तु उन्हें उस वेला क्रूर अचम्भे का शिकार होना पड़ा, जब दक्खन सल्तनत के विरुद्ध तलिकोटा कि लड़ाई में उन्हें युद्ध के एक महत्त्वपूर्ण क्षण अपने मुस्लिम सिपाहियों का विद्रोह देखना पड़ा! वह युद्ध जो अब तक विजयनगर को जीत की ओर ले जा रहा था, इस घटना के कारण वह अब दुश्मनों कि झोली में जा बैठा, और विजयनगर साम्राज्य दुश्मन के हाथ आ गया| कारण?! विजयनगर की पीठ में में अपने ही मुस्लिम सेनापतियों तथा सिपाहियों द्वारा छुरा घोंपा जाना!

इस वाक्ये में सबसे अहम् भूमिका रही, गिलानी भाइयों की, जो कि विजयनगर की सेना में सेनापति थे| लड़ाई के अहम् चरण में सेना के मुस्लिम अधिकारियों ने अपनी ही सेना पर पीछे से धावा बोल दिया! अचानक ही राजा राम राय यह देखकर अवाक् रह गए कि उनकी ही सेना की दो मुस्लिम टुकड़ियाँ उनके ही ख़िलाफ़ हो गईं! इन टुकड़ियों ने पीछे से भीषण प्रहार करते हुए कई तोपों पर कब्ज़ा कर लिया| कई तोप के गोले राजा राम राय के हाथी के बगल आकर गिरे, और वे अपनी सवारी से ऐसे ही एक तोप के गोले से घायल होकर नीचे गिर पड़े| राजा सँभलने का प्रयत्न कर ही रहे थे कि इतने में निज़ाम शाह उनको पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा|

ये मुसलमान सिपाही विजयनगर की सेना के सम्मानित सैनिक थे, जिन्हें बराबरी का दर्जा हासिल था, पर यह भी इन्हें ऐन मौके पर द्रोह करने से न रोक पाया| बस “इस्लाम ख़तरे में है” की एक पुकार ही इनके लिए पर्याप्त थी, अपने ‘काफिर’ हिन्दू राजा के विरुद्ध दुश्मन मुस्लिम सेना से हाथ मिलाने को! इस युद्ध के परिणाम घातक साबित हुए, कारण कि मुस्लिम सेनाओं ने फिर कूच करते हुए विजयनगर साम्राज्य कि राजधानी हम्पी को तहस-नहस कर डाला, और इस वैभवशाली साम्राज्य का यहाँ से पतन प्रारम्भ हो गया!

मुसलमनों पर अपना भरोसा रख छोड़ने की यही भूल फिर दोहराई अगली बार मराठाओं ने, जो कि फिर पानीपत के तीसरे युद्ध में उनकी हार का एक प्रमुख कारण बना| पूर्व की लड़ाइयों में, शुजाउद्दौला के पिता की मराठाओं ने काफी सहायता की थी, तथा वह इस रूप से उनके साथी भी माने जाते थे| परन्तु जब मराठाओं को अफगानों के विरुद्ध शुजाउद्दौला की मदद की दरकार हुयी, तो उसने उनको सहायता देने की बजाय उनकी पीठ में छुरा घोंपते हुए मराठा सेना के आपूर्ति मार्गों पर हमला बोल दिया (ग़द्दारी का यह वाक़या शिया-सुन्नी मतभेद और झगड़े को दुहने के विषय में, जैसा कि कुछ भारतीय राष्ट्रवादी प्रतिपादित करते हैं, एक रोचक विषय-वस्तु बनाता है)| शुजाउद्दौला, जो कि एक शिया था, को कई दफ़ा सुन्नी अफ़गानों और रोहिलाओं के अपने ‘गैर-इस्लामी’होने के तंज को सहना पड़ा था; इसके बावजूद उसने ये सब मतभेद दरकिनार करते हुए उम्मा के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए ‘काफ़िर’ मराठाओं के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी, वो भी अपनी अम्मी के हज़ार मर्तबा समझाने के बावजूद, कि उसे मराठाओं का साथ देना चाहिए जो कि उसके अब्बू के मित्र थे|

 

भारतीय हिन्द फ़ौज (INA) से प्रमाण

अविभाजित ब्रिटिश भारत के इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम दंगे एक अहम कड़ी हैं। चूँकि स्वतन्त्र भारत की सरकारों ने भ.हि.फौ. की भूमिका को कमतर करके ही प्रस्तुत किया है, सामान्यजन भी इस फ़ौज की कुछ कमियों की जानकारी से वन्चित रह गए हैं, मुख्यतः फ़ौज के मुस्लिम सैनिकों के व्यवहार को लेकर, जो कि इस लेख का भी प्रमुख केन्द्र-बिन्दु है। जानकारी के लिए यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयँ नेताजी भी एक बड़े इस्लाम-पसन्द व्यक्ति थे, तथा मुसलामानों की सुविधा-सुख हेतु सदैव तत्पर से प्रतीत होते थे, एवम् यह तक कहा करते थे हिन्दुओं को बहुसंख्यक होने के नाते मुसलामानों के प्रति उदार होना चाहिए! परन्तु, एक सामान्य मुस्लिम दॄष्टिकोण के अनुसार यह व्यवहार दुर्बलता की एक निशानी मात्र थी। मुसलमान भ.हि.फौ. के अन्तर्भाग जिसका कि नेताजी स्वयँ नेतृत्व करते थे, उसके एक प्रमुख अंग थे, तथा उसकी कई इकाईयों में शामिल थे। इसमें से बड़ी सँख्या में तो वो लोग थे जो भ.हि.फौ. से इसलिए जुड़े थे क्योंकि मित्र-देश तुर्की के विरुद्ध थे, जो कि अभी भी कई मुसलामानों के द्वारा पुराने तुर्क ख़लीफ़ा के अवशेष के रूप में देखा-समझा जाता था। चूँकि नेताजी ने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया, उन्हें तब अचम्भे का शिकार होना पड़ा जब युद्ध के परवर्ती चरण में उन्हें बड़ी सँख्या में मुस्लिम सैनिकों का विश्वासघात, अपसरण देखना पड़ा। इस घटना के पीछे की प्रेरणा थी तुर्की का अपना मत बदलना तथा मित्र-देशों के साथ हो जाना| इनमें से कई सैनिक भाग खड़े हुए, तथा शेष वापस अंग्रेज़ी सेना में जा मिले|

नेताजी ने तुर्की के द्रष्टिकोण में आये इस बदलाव को वैश्विक-राजनीति के परिप्रेक्ष्य में समझाने का प्रयास भी किया, परन्तु इस अपसरण को रोक पाने में असफल रहे। इस प्रकार पुनः मुस्लिमों ने इस तथ्य का परिचय दिया कि उन्हें ‘दार-उल-इस्लामी’ पहचान अधिक प्रिय है, न कि एक राष्ट्रीय पहचान, तथा तुर्की के साथी अंग्रेज़ों की गुलामी करना पसंद किया, बजाए राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए लड़ना। यहाँ यह भी स्मरण रखने योग्य है कि १९४८ में बनी नयी-नवेली पाकी सेना ने इन भगोड़ों में से कईयों को अपने में शामिल किया। यह मलेशिया के तमिल हिन्दुओं के बिलकुल उलट व्यवहार था, जिन्होंने कभी भी अपनी मूल मातृभूमि नहीं देखी थी, फिर भी नेताजी की भारतीय हिन्द फ़ौज में अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने को शामिल हो गए, तथा अन्त तक नेताजी को अपना नायक मानते रहे।

 

वर्त्तमान व भविष्य

आज भी कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें भारतीय सेना में कार्यरत कई मुस्लिम पाकिस्तान के लिए गुप्तचरी करते हुए पकड़े गए हैं। भारतीय सेना में केवल २% भागीदारी होने के बावजूद, मुस्लिम गुप्तचर अधिक सँख्या में पकड़े  गए हैं। वह इसलिए क्योंकि ‘राष्ट्रवाद’ इस्लाम में मूर्ति-भन्जन के समान ही माना गया है; तथा यही कारण है कि देवबन्दी भारत के इस्लाम के नाम पर विभाजन के विचार के विरुद्ध थे, क्योंकि इस्लाम में राष्ट्र-राज्य अथवा राष्ट्रवाद मूर्ति-भन्जन समरूप ही है, और निष्ठा केवल इस्लाम और अल्लाह के प्रति ही माँगी जाती है। इसीलिए आये दिन यह ख़बरें भी सुनने मिलती हैं कि मुस्लिम समाज ‘जय हिन्द’ जैसे नारों के भी विरोध में हैं, क्योंकि इस्लाम सिर्फ़ अल्लाह के सिवाय किसी और के महिमामण्डन की अनुमति नहीं देता।

इसका यह तात्पर्य नहीं कि सेना में कार्यरत मुस्लिम देशद्रोही ही हैं। इसी सेना में से मुस्लिम रणबाँकुरे भी निकले हैं जिन्हें ‘परमवीर चक्र’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए। अपितु, सँख्या पूरे परिप्रेक्ष्य में देखें तो नाममात्र ही है। इस दृष्टि से, यह भी विचारणीय है कि ऐसे कुछ के लिए क्या पूरे मुस्लिम समुदाय पर पूर्णरूपेण भरोसा करने का जोख़िम उठाना तर्कसंगत रहेगा, विशेषकर कि तब जब भारतीय भूभाग के एक बड़े हिस्से का हमारे हाथ से निकलकर पश्चिमी/मध्य-पश्चिमी इस्लामी बर्बरों के हाथों में पहुँच जाना एक बेहद गम्भीर तथा वास्तविक ख़तरा है (और आख्रिकार, विभाजन की त्रासदी कोई ज्युरास्सिक काल में तो हुयी नहीं थी!)?!! नए ज़माने की लड़ाईयों में निर्णायक मोड़ गुप्त सूचनाओं तथा उनके आधार पर की गयी कार्यवाहियों पर अधिक निर्भर करते हैं। इन मुद्दों पर विचार करते हुए यह समझा जा सकता है कि केवल अपनी सतही नैतिकता की ख़ातिर इस्लाम जैसी विघटनकारी शक्ति के ख़तरे को दरकिनार कर देना निरी मूर्खता ही होगी।

सच्चर समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह विवाद उपजा कि क्या सेना की धार्मिक रचना में परिवर्तन करके मुसलमानों को अधिक सँख्या में चयनित किया जाना सही होगा?! मुस्लिम विश्वासघात के लम्बे इतिहास को नज़र में रखते हुए, ऐसा करना देश की सुरक्षा के साथ एक खिलवाड़ करना ही होगा। जबरदस्ती की नैतिकता की खोखली बातें करके और उनके लिए कुतर्कबाजी करके बजाय फ़र्ज़ी सेक्युलरिज़म की ख़ातिर, भारत को चाहिए कि यथार्थवादी रुख अपनाते हुए सेना में मुस्लिमों के चयन पर एक सीमा को लागू रखे, जैसी नीति स्वतन्त्रता के बाद से रही ही है। श्री जॉर्ज फर्नांडिस के शब्दों में – “मुस्लिम, सेना में अधिक माँग में नहीं हैं क्योंकि वे सदैव से अविश्वसनीय माने जाते रहे हैं, भले ही इसे हम खुलेआम स्वीकार करें या न करें। अधिकतर भारतीय, मुसलामानों को पाकिस्तान का पाँचवा स्तम्भ मानते हैं।”

यदि भारत, इतिहास में विजयनगर तथा मराठाओं की घटनाओं के सबक़ की उपेक्षा करके कोई क़दम उठाता है, तो उसका भी आने वाले समय की इतिहास-पुस्तकों तथा अजायबघरों में जल्द दर्ज हो जाना लगभग तय है।

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